Wednesday, 23 November 2016

॥ ५०॥ वाघोबा टोली को बापजी भड़काता है ॥ ५०॥

॥ ५०॥ वाघोबा टोली को बापजी भड़काता है ॥ ५०॥

रात आई। आकाश में चंद्रमा उदित हुआ। मंद हवा चलने लगी।
बापजी के सामने कई आदमी बैठे थे। लाल्या पाषाण्या भी थे।
उदेती की टोली...... अच्छी थी।
बापजी ने कहानी आरम्भ की।
लोग धान बोते थे, काटते थे, खाते थे।
बापजी ने अधखुली आँखों से देखा। लोग एकाग्र होकर कहानी सुन रहे थे।
कभी कभी मेरे जैसा अकेला आदमी भी वहाँ जाता था।

पंछी की तरह उसे बुलाते थे। धान के दाने खाने को दे देते थे। खाकर हम वापस लौट आते।
 तुम गए थे वहाँ?
हाँ।
कब?
बहुत ऋतु बीत गए। बापजी ने कुछ विचारते हुए कहा।
फिर?
बहुत ऋतु बीते। वहाँ एक नई बाई प्रमुख बनी। उसे जुगने वाला एक आदमी भी था।
.....................
उसने कई हड्डियाँ इकट्ठी कीं। एक हड्डी थी शैतान के जानवर की।
सुनने वाले थर्रा गए।
तबसे वह टोली बदल ही गई।
बापजी ने अपने पांवों की अदला बदल की। फिर भी सामने बैठी सभी स्तब्ध।
पंगुल्या खिद खिद कर हंसा।
हड्डियाँ रखने से शैतान बस में होता है?
मेरे पास हैं ढेर सी हड्डियाँ। छोटी, बड़ी, टूटी हुई और साबुत भी। क्या मैं तुम्हें शैतान दीखता हूँ?
बापजी ने साँस रोक ली। मन ही मन कहा- अब पंगुल्या का मरण पास आ गया।इसके प्रश्न रुकते नही हैं।
फिर आगे कहने लगा-
इसके लिए क्या करना पड़ता है?
नचंदी की रात को एक जुगने वाला रीछ पकडना पडता है।
उसे मार कर उसका मांस खाओ। हड्डियाँ चबाओ फिर मंत्र पढते हुए नाच करो। मंत्र से मृतात्मा का आह्वान करो।
तब शैतान बस में आता है।
सबने गर्दन हिलाई। सबकी आँखों में एक भय.... एक उन्माद।
पंगुल्या फिर खिद खिद हंसा।
सारे चौंक गए।
चार आदमी उठे। पंगुल्या को घेर लिया।
एका ने उसे उलटे हाथ से थप्पड़ मारी। पंगुल्या की आंखों के सामने अंधेरा छा गया।
माथा टेक........। लाल्या गुरगुराया।
पंगुल्या थरथराने लगा। घिसटते हुए बापजी के पैरों में माथा टेककर कूल्हे घिसटते हुए दूर जा बैठा।
बापजी ने लाल्या की ओर देखा। गर्दन हिलाई।
लाल्या उठा। लाठी संभालता हुआ बढा।
जैसे बिजली चमके, ऐसे एक बार उसकी लाठी कौंध गई।
पंगुल्या औंधा गिरा और निष्प्राण पडा रहा। सारे कांप गए।
पाषाण्या उठा। उसकी मुठ्ठियाँ भींची हुई थीं और आँखें लाल।
वह दौडता इससे पहले बुढिया सामने आ गई।
टोली के शंकालुओं के लाड करना छोडो। वह अपनी कर्कश आवाज में चिल्लाई।
बापजी ने हाथ उठा दिया।
लाल्या फिर आगे आया। उंची आवाज में बोला-
बापजी हमारा गुरु है...... आज से।
वह बोलता है, मृतात्माओं के साथ.......। वह ठीक कहता है। कोई उसके आडे नही आएगा।
यदि आया तो उसे मार डालूँगा।
पाषाण्या मानों अपनी जगह पर चिपक गया।
बापजी हंसा।
जाने दो..... ये सारे छोटे हैं....... पिलू हैं।

मैं बड़ा हूँ तो समझाने का काम भी मेरा ही है।
गला खँखार कर एक बार फिर उसने कहानी आगे बढाई।
वह बाई....... प्रमुख हुई और शैतान भी हुई।
फिर उसने आज्ञा की--
वाघोबा टोली का मरण।
वाघोबा टोली की हरेक सू को जुगो। अपनी टोली में लाओ। और हर आदमी को मरण।
पूरे चंद्रमा के दिन रक्त माँस से जमीन लथपथ कर दो।
फिर धानबस्ती को धान मिलता रहेगा। धानबस्ती कभी नही मरेगी।
मृतात्मा उसे सदा जीवित रखेंगे। हमें मंत्र मिलेगा।
फिर जानवर, शिकार अपने आप चलकर हमारे पास आ जाएंगे।
फिर भूखा नही रहना होगा। फिर मरण भी दूर रहेगा।
लेकिन यह होना हो तो वाघोबा बस्ती का मरण चाहिए। उसके आदमियों की बली चाहिए।
सारे फिर थर्रा गए।
लाल्या ने लाठी उठाई। उसके चार साथी खडे हुए। एक कोने में थरथराती उंचाडी को सामने खींचा।
वह चीखी। इतर सूएँ हँसने लगीं।
बापजी कडुआहट से भर गया। यही सू उस दिन देखी थी...। जंगल में.. उसके पिलू के साथ।
आ गई इनकी पकड में। और इसका पिलू?
वह काँप गया।
यह धानबस्ती की है। जुगो इसे। लाल्या चीखा।
हमारी सूओंको जुगने की बात करते हैं।
लाल्या उसके मुँह पर थूका। धर लो इसे।
आदमी चारों ओर जमा हुए। बुढिया ने उंचाडी का माथा दबाकर रख्खा।
लाल्या उससे जुगने लगा।
एक सू खिदखिदाई।
बापजी को भ्रम हुआ... चंद्रमा, मंद हवा, जंगल और यह सू।
उसका सर धूम गया।
एक ही क्षण। फिर संभल गया।
यह टोली भी मरनी चाहिए। मैं मारूँगा...
बापजी घुटने में सिर देकर थरथराता रहा।
लाल्या अलग हुआ।
उसके बाद कई। एक एक करके।
उंचाडी की चीखें उसके कानों तक आती रही।
देख बापजी देख.....। आदमी टोली में रहा तो कैसा जानवर बन जाता है।
आदमी के मन में एक पेड़ पनपने लगता है।
उस पेड का नाम - मैं।
फिर इस 'मैं' का पेड बड़ा या उस 'मैं' का बड़ा।
फिर दोनों की टक्कर। आदमी को आदमी के रक्त का स्वाद।
कष्ट से बापजी उठा और धीरे धीरे चल दिया।
बेसुध औंधे पडे पंगुल्या से उसका पैर टकरा गया। एक करुणा बापजी की छाती में भर गई। वह बुदबुदाया--
पंगुल्या यों बापजी के आडे आए?
कितना समझाया--
तेरे पास दिमाग है। आँख कान हैं। तू सोचता है।
इन जानवरों जैसा नही है तू।
लेकिन फिर भी नही माना पंगुल्या।
अरे, तू भी तो एक पिलू ही है। और मुझसे भिड़ गया?
तू कोई फेंगाडया है? ताड जैसा उंचा तगडा? कि तू मुझे आडे आए? इतना सा विचार नही किया तूने?
जीभ बहुत चलती है तेरी। कहा था, दबाकर रख उसे .. नही तो मारा जायगा।
बापजी आगे बढा।
झोपडी के पास थमक गया।
बांस से बांस टिकाकर बनाई गई झोंपडी। उस पर सूखे पत्ते और कीचड़ का लेप।
वह अंदर घुसा। औंधा पड गया।
बाकी टोली की चाहे जो बुराइयाँ हों- लेकिन टोली में ही झोंपडी है- झोंपडीकी गर्मी है। वह हँसा।
भरमा गया तू बापजी.... भरमा गया।
कई दिन.... कई रात। तू भी इस तरह बैठ कर खाता रहा.......
तो पूरा भरमा जायगा तू।
अब भी झटपट कुछ कर। वह जोर से बोला।
नही तो पता है क्या?
बापजी को टोली अच्छी लगनी लगेगी।
और जाके जुग लेगा उस बुढिया से।
कहेगा- क्या बुरा है?
वह हँसा। देखता रहा अपना भैंसे जैसा ताकदवर जीवन।
वहाँ नही थे नरबली...... नही था उंचाडी से क्रूर जुगना। उसकी चीखें ।
देर तक बापजी जागता रहा।
बाहर ठण्डी हवा बहने लगी तो हाथ पांव सिकोड़कर, सूखे पत्ते शरीर पर लेकर बापजी सो गया।
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48+49॥ ४८॥ पंगुल्या की हड्डी-टोली ॥ ४८॥॥ ४९॥ फेंगाडया और कोमल ॥ ४९॥

48+49

॥ ४८॥ पंगुल्या की हड्डी-टोली ॥ ४८॥

झरने के किनारे पाषाण्या अकेला बैठा था। आवाज सुनकर मुडा।
पंगुल्या था।
पाषाण्या के चेहरे पर हँसी छलक आई।
उधर सूर्यदेव डूबने चले थे।
पंगुल्या सामने आया।
आज यहाँ अकेले ही? उसने पाषाण्या से पूछा। शिकार पर नही गये?
पाषाण्या ने गर्दन हिलाई- बापजी कहता है- टोली का मुखिया शिकार नही करता। पाषाण्या थूका- बापजी ने कहा तो सभी ने कहा- हाँ, जय पाषाण्या।
पंगुल्या ने आँख गाडकर उसे देखा। आगे आकर आवेश से पाषाण्या की कलाई पकड़ ली।
बापजी कहता है, लाल्या सुनता है, आदमी सुनते हैं, सूएँ भी सुनती हैं।
पंगुल्या की आवाज तीखी होती गई।
अब हमारी टोली में 'बापजी कहता है'।......'पाषाण्या कहता है' नही।
पाषाण्या ने लम्बी साँस खींची। तू क्या कहना चाहता है?
पंगुल्या थूका।
बापजी पहली बार मिला था, तभी मैंने कहा था- इसकी बली चढा दे।
पाषाण्या ने हलचल की।
मान लो मेरी पाषाण्या। आज भी..... मार डालो उसे।
पाषाण्या ने गर्दन हिलाई-- अब संभव नही।
पंगुल्या ने उसके कंधे पकडे। झकझोरते हुए बोला-- कौन यह बापजी? कहाँ से आया? क्या चाहता है? पूछो उसे। इतना तो पूछो।
पाषाण्या ने गर्दन हिलाई।
कम से कम इतना तो पूछना ही पड़ेगा।
पाषाण्या ने फिर गर्दन हिलाई। उसे छोड़कर पंगुल्या सामने कातल पर आ बैठा। नीचे झरना बह रहा था।
पाषाण्या, तू मुखिया है हमारी टोली का।

पंगुल्या धीमी आवाज में कहने लगा। तुझे ही क्यों, हर टोली के हर मुखिया को नए आदमी से सावधान रहना चाहिए। नए आदमी की टोली में लेने से पहले मुखिया को पूछना चाहिए-- यह कौन है?
क्या करता है? इसे क्या चाहिए?
जब तक ये प्रश्न पूछने का समय है, तभी पूछने चाहिए। जो ये प्रश्न तब नही पूछ सकेगा, वह कभी नही पूछ सकेगा।
पाषाण्या उठा। थूक निगलते हुए मुडा और चला गया।
पंगुल्या झरने की आवाज सुनता बैठा रहा।
अनायास उसके हाथ बगल की घास में खेलते रहे।
वहाँ एक हड्डी पड़ी थी।
चपटी, गोलाकार।
झुककर उसने हड्डी उठाई।
जंगली भैंसे की है....वह बुदबुदाया।
कहाँ की?
शायद छाती की।
क्या मनुष्य की छाती की हड्डी भी ऐसी ही होती है-- आधे गोल आकार की?
हड्डी के दोनों छोर उसने दो मुठ्ठियों में जकड़ लिए।
हड्डी झुकाने की कोशिश करने लगा।
अचानक एक छोर हाथ से छिटक गया। सुंईच्च्च्च्..., एक तेज आवाज आई। उसका दूसरा हाथ झनझना गया।
डर कर पंगुल्या ने हड्डी को फेंक दिया।
उसकी तरफ देखते हुए बोला-- मरी हुई हड्डी में भी इतनी ताकत होती है?
डरकर भी पंगुल्या उस हड्डी से अपनी आँखें नहीं खींच सका। झुककर उसने फिर हड्डी उठाई।
फिर दोनों हाथों से तानी, फिर छोड़ी।
दूसरा हाथ फिर झनझनाया। सुँईच्च्च्च् की आवाज फिर भर गई झरने में।
कई बार पंगुल्या ने हड्डी को आजमाया।
एक पंछी पेड़ पर से उड़ा, उसकी बीट पंगुल्या के सिर पर गिरी।
थूकते हुए वह चिल्लाया-
तुझे भी मारूँगा एक दिन और तेरी भी हड्डियाँ चुनूँगा।
पहले आदमी की हड्डियाँ, फिर भैंसे की, फिर पक्षी की।
पंगुल्या अब तू अपनी हड्डी टोली बना ले।
हड्डी टोली-- पंगुल्या हँसा।
भैंसे की हड्डी को फिर परखा।
इसका क्या उपयोग
है। बस्ती पर जो भैंसे से मूर्ख हैं उन्हें डराना के लिए अच्छी है।
कहेंगे-- अब पंगुल्या भैंसे की मृतात्मा से भी बात करता है।
पंगुल्या जोर से हँसा। थूका।
जहाँ पाषाण्या जैसे मूर्ख नेता हों वहाँ हड्डी टोली जरूर चाहिए।
वह अपनी झोंपड़ी को चल दिया।
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॥ ४९॥ फेंगाडया और कोमल ॥ ४९॥

सूरज उगने से पहले ही फेंगाडया ने कोमल को कोंचा। वह चौंककर उठ गई। उसे कुछ समझ नही आ रहा था।
धीरे धीरे उसने समझा। वह फेंगाडया की गुफा में थी। बाहर अलाव जल रहा था।
फेंगाडया उठा। सूअर की टांग भूनने के लिए अलाव में डाल दी।

उसकी हलचल से लंबूटांगी जाग गई। साथ साथ लुकडया।
फेंगाडया उसे उठाकर बाहर ले गया।
थोडी देर में वापस गुफा में डाल दिया।
पैर जमीन से लगा तो लुकडया फिर चीखने लगा। फेंगाडया ने उसके पैर से बंधी बेलें फिर एक बार कस दीं।
हांफते हुए लुकडया उसे ठेलता रहा।
कोमल अब सावधान हो चली थी। आश्चर्य से उसकी आंखें चौडी हो गईं।
लम्बूटांगी आगे आई। जखमी लुकडया का सिर गोद में लेकर सूअर की भुनी टांग उसके मुँह में डाली।
कोमल गाल पर हाथ रखकर सब देख रही थी। वह उठी। जाकर लुकडया के जखमी पैर के पास बैठ गई। हलके से अपना हाथ उसके पैर पर फेरा।
उसके स्पर्श से लुकडया ने आंखें खोलीं।
कितने दिन..... रात। वह चिल्लाया। मैं जखमी इस गुफा में। इसने यहाँ लाकर रख दिया। यह दुख- ये वेदना। वह फिर कराहा। कोमल ने सिर हिलाया। बाहर आ रहे मांस को फिर उसके मुँह में ठूँसा। इस बार वह खाने लगा।
भूख.... रोज भूख।
ये दोनों.... खाने के लिए ले आते हैं। मैं थूकता हूँ। बार बार।
लेकिन पेट में भूख बढती है। फिर खा लेता हूँ। जी लेता हूँ।
कोमल हंसी।
लुकडया ने पूछा- तुम्हारे साथ कोई आदमी? नही। कोमल ने सिर हिलाया।
फिर? जंगल में अकेली कैसे?
मैं धानबस्ती पर रहती हूँ। उदेती दिशा मे...... कोमल ने अपने माथे से केश पीछे किए और एक दिशा में इशारा किया।
उसका चेहरा सौम्य।
चेहरे पर भोर का उजाला। आंखों में चमक। उदेती? धान?
हाँ।
सुना है धान बहुत उगता है। बढता है......।
फिर शिकार नही चाहिए?
शिकार तो चाहिए ही। लेकिन न मिले तो धान।
हाँ। लुकडया ने चूसी हुई हड्डी हाथ में ले ली। तुम्हारे यहाँ आदमी जखमी हो जाए जंगल में, तो उसे लाते हैं जिलाने के लिए?
नही। कोमल ने सिर हिलाया।
मैं ले आया। इसे जिलाने के लिए। फेंगाडया ने अंदर आते हुए कहा।
तू इसे जखमी, जंगल से ले आया?
हां।
नियम तोड कर? क्यों?
फेंगाडया उकडूँ बैठ गया था। एक छलांग में आगे आकर कोमल को केश पकड लिए। उसे हिलाते हुए बोला--
तूच् नियम तोडकर कल तुझे नही उठा लाता तो?
बची रहती तू जंगल में?
मर नही जाती? यदि मैं नही लाता।
कोमल हंसी। मुझे क्यों उठा लाए?
लंबूटांगी उठी। दोनों के बीच आ गई। कोमल का चेहरा छू कर बोली- तू अच्छी है।
लंबूटांगी उसे एकटक देख रही थी।
कोमल को चेहरा भय से सफेद।
फेंगाडया के चेहरे पर भाव बदलते हुए।
तुझे जुगने के लिये उठा लाया। लंबूटांगी ने खिलखिलाकर कहा।



फेंगाडया ने फट् से लंबूटांगी को थप्पड मारी। लेकिन उसमें जोर नही था।
लंबूटांगी फिर खिलखिलाई।
इसे.... इस सू को तू जुगने के लिए उठा लाया।
और लुकडया को? इस आदमी को? फेंगाडया ने चिल्लाकर पूछा। इसे क्यों लाया? जुगने के लिए? कोमल, लंबूटांगी और लुकडया भी हंसने लगे।
फेंगाडया और चिढ गया। हाथ पैर मारते हुए बोला- मैं उठा लाऊँगा। हर आदमी को, हर सू को।
जब तक ये कंधे हैं, हाथ हैं, पांव हैं..... तबतक।
मैं उठा लाऊँगा।
क्यों?
क्यों कि मुझे लगता है कोई अकेला जंगल में नही मरना चाहिए।
कोई अकेला जानवरों का ग्रास न बने।
आदमी जनमता है, सू की जांघों से।
क्या इस तरह मर जाने के लिए?
बापजी कहता था- एक दो..... और दो...... कई पिलू मरते हैं, तब एक पिलू बचता है। ऐसे कई बचे हुए पिलू बढते हैं, तब एक बचकर बडा होता है, आदमी बनता है। या सू बनता है।
फिर हंसता है, बोलता है, शिकार करता है, जुगता है।
ऐसे आदमी को जंगल में छोड देना?
नही।
फेंगाडया तडाक्‌ से उठा। उसके झटके से लंबूटांगी गिर गई। वह ताडताड् पैर पटकते हुए गुफा से बाहर चला गया।
लंबूटांगी और कोमल फिर खिलखिलाईं।
लुकडया ने पूछा- तू वापस जाएगी?
फेंगाडया ले आया है मुझे। वह छोडेगा?
कोमल ने पूछा। भय से वह थरथरा गई।
अगर सच ही फेंगाडया ने उसे जाने के लिए कह दिया तो?
फिर उसे धानबस्ती पर अपना पिलू दीखने लगा।
वह फिर से थरथराई।
धानबस्ती का नियम था। सात दिन, सात रात का।
बस्ती से बाहर जाने वाला आदमी या सू उतने दिन में वापस नही लौटे तो पायडया धान में उसकी आकृति बनाता था। मंत्र पढकर औंढया देव बुलाता था। खोए हुए आदमी या सू को मृतात्मा बनाकर फिर से नक्षत्र बनाकर आकाश में भेज देने के लिए।
आज तक धानबस्ती पर सात दिन सात रातों के बाद कोई वापस नही आया था।
मुझे जाना होगा। कोमल रोते हुए बोली।
तो फिर जाओ। लुकडया ने गर्दन घुमा ली।
लेकिन फेंगाडया। वह कहेगा, इसे चीते के सामने से अधमरी उठा लाया, खाने को सूअर का मांस दिया, अलाव दिया, गुफा में रहने को जगह दी... और अब यह वापस चली।
कौन है ये, कोई सू या मृतात्मा?
लंबूटांगी ने सिर हिलाया।
कोमल देर तक रोती रही।
मैं दूध भरे थानों वाली। कोमल ने अपना थान दबाकर दूध दिखाया।
थान भर आए हैं। मेरा पिलू उधर है और फेंगाडया इधर।
दोनों चाहिए मुझे।
मैं क्या करूँ?



गदगदा कर रोते हुए उसने अपना सिर गुफा की दीवार पर टिका दिया।
लुकडया फिर चिल्लाया--
यह फेंगाडया बडा आदमी बना फिरता है।
इसी ने किया है सब।
इसी ने जाल बनाया है।
बेलों की जगह हमें, फंसा दिया है।
यह रुकेगा नही।
पहले मुझे ले आया- फिर तुझे।
फांस लिया जाल में।
यह तीन तीन के लिए अकेला शिकार करता है। लाके पटकता है हमारे सामने।
वराह को मारता है अकेले- केवल हाथ से- मानों कोई खरहा मार रहा हो।
इसी से इसका पागलपन। यह भरमाना।
लेकिन सोचो, अगर यही नियम बन गया कि कोई जखमी हो जाए तो उसे उठाओ, ले आओ और पोसो।
फिर यही फेंगाडया औंधा हो गया।
जखमी हो गया।
मेरी जगह फेंगाडया जखमी हो गया, तो लुकडया कैसे उठाएगा, कैसे पोसेगा?
और मेरी छोडो.....
इस सू को लगे कि जखमी फेंगाडया को उठाओ, तो कैसे लाएगी, कैसे पोसेगी?
कैसे करेगी दो दो के लिए शिकार?
नही, ऐसा नियम नहीं बनना चाहिए। आज जो निमय है, वह नही टूटना चाहिए।
इसे अकेले को भरमने दो। सुनने दो छाती के अंदर की आवाज। बापजी की आवाज.... देवा की आवाज।
लुकडया तिरस्कार से थूका।
उसे करने दो यह अकेले। मुझे, तुम्हें पहला ही नियम चलाना होगा।
उसी को मानना होगा।
हमपर बारी आई जखमी फेंगाडया को उठाने की, तो हमें वहाँ से भाग जाना होगा- उसे अकेले जखमी छोडकर।
लुकडया रोने लगा- मैं नही चाहता कि कभी फेंगाडया को जखमी छोड़कर भागना पडे। उससे पहले मैं मर जाना चाहता हूँ।
फेंगाडया अंदर आया। समझ नही पाया कि क्या हो रहा है। उसने लुकडया के माथे पर हाथ रखा।
लुकडया गदगदाया। लंबूटांगी सिर झुकाकर नीचे देखती रही।
कोमल की आंखों में आंसू आ गए।
उन्हीं में चमकती रही धान की बालियाँ।
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46+47 ॥ ४६॥ फेंगाडया और पेड़ ॥ ४६॥॥ ४७॥ लाल्या की पकड में उंचाडी ॥ ४७॥

46+47

॥ ४६॥ फेंगाडया और पेड़ ॥ ४६॥

फेंगाडया ने आँखें खोलीं। आधी बीत चली थी रात।
वह पीठ के बल लेटा हुआ। ऊपर वह पेड़- झिलमिल पत्त्िायों वाला। सरसराहट होती है तो लगता है उससे बातें कर रहा है।
बापजी गया तबसे यही पेड़ उसका बापजी बना हुआ है।
पेड़ हँसा। वह भी हँसा।
कौन मेरी समझ रख्खेगा। तू ही रख। वह पेड़ से फुसफसाया।
उसने टहनियों को देखा। पत्त्िायों को देखा। झिलमिलाने वाली जीवन्त पत्त्िायाँ।
एक पत्ता टूटा। भिर भिर घूमते हुए उसके पैरों पर आ गिरा।
उसने पत्ता उठाकर देखा। पीला पड़ चुका था।
पेड़ का आधार छोड़कर निकल चुका हो कोई पत्ता तो हराभरा कैसे रहेगा?
वह पीला हो ही जाएगा। मुरझायेगा। मिट्टी से मिलेगा। मर जायेगा।
वह सिहर गया।
मरण।
लुकडया बच गया। कोमल भी बच गई।
मरण को भगा दिया उसने दूर।
अपनी छाती की आवाज सुनकर। अपने काम से।
मानों उसने पीले पड़े पत्ते को उठाकर फिर से पेड़ से चिपका दिया था।
इतने दिन पत्ते पीले पड़ते थे। झड़ते थे और मिट्टी हो जाते थे।
आदमी देखता था। उसके हाथ थे।
उसे हलचल करने की छूट थी।पेड़ की तरह बंधा नही था आदमी। लेकिन उसकी आँखें बंद थीं।
जो आदमी अंदर की आवाज नहीं सुन सकता वह नियम के सिवा क्या बोलेगा?
और नियम के रास्ते पर इस पीले मरण के सिवा और क्या होगा?
आदमी को पहल करने की, हिलने डूलने की छूट थी। तो आना चाहिए आगे, थाम लेना चाहिए गिरता हुआ पत्ता और चिपका देना चाहिए उसे वापस हरे भरे जीवन्त पेड़ में।
  
लेकिन आदमी ने यह कभी किया नही।
आदमी हो गया है देवता से दूर।
उसके अंदर की आवाज गुम हो गई है।
अब वह सुनता है केवल बाहर की आवाज- नियम की आवाज।
लेकिन आज उसने कुछ किया नियम से अलग।
वह चल सकता है अपनी अलग राह पर।
उसे लगा पेड़ उससे बात कर रहा है।
तू ही है मेरा हरा पत्ता--
रस से भरपूर। जीवन्त। ताजा। हर पल जीने वाला।
फेंगाडया हंसा। उसे लगा वह बहुत अलग है- इन टूटे, भरभराकर जमीन पर गिरते पत्तों की तरह जीने वाले, मरने वालो इन बाकी आदमियों से वह अलग है।
फिर एक बार वह सिहर गया।
कितनी कठिन बातें करता है तू। उसने पेड़ से कहा।
पीछे झाड़ियों में कुछ सरसराया और एक झटके से फेंगाडया खड़ा हो गया। सामने एक अर्धवयस्क चीता था। गुरगुरा रहा था।
चीता झपटा। फेंगाडया बाँई ओर झुककर अपने आप को बचाया। फिर पैर पर ही पूरा घूमते हुए उसने चीते पर छलांग लगाई।
अब उसकी मजबूत पकड़ थी चीते की गर्दन पर।
अनक क्षण। पकड़ जरा भी ढीली नही हो सकती।
आखिर चीता ठण्डा पड़ गया।
एक ही झटके से उसे नीचे की घाटी में फेंक दिया फेंगाडया ने।
थकान से चूर, पसीने नहाया फेंगाडया पेड़ के नीचे आया।
अपने आप से कहा-- इस तरह रातभर पगलाकर बाहर घूमते रहने के लिये अब तू स्वतंत्र नही है। अब तू अकेला नही है।
वह मुड़ा और चल दिया गुफा की ओर।
उसका पेड़ हवा में सरसराता रहा।
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॥ ४७॥ लाल्या की पकड में उंचाडी ॥ ४७॥

झिंग्या हांफते हुए उंचाडी के पीछे भाग रहा था।
उंचाडी का शरीर मानों अंगार। बुखार से तपता हुआ। खांसी।
झिंग्या का चेहरा भूख से अकुलाया हुआ।
उंचाडी भागी चली जा रही थी।
आँखें भिरभिरा रही थीं चारों ओर।
हांफते हुए वह धप्प से बैठ गई।उसके केश उड रहे थे।
झिंग्या पास आया तो वह उठी। आगे चलने लगी।
सूरज डूबने में कुछ ही देर बाकी थी।
आज इतने दूर चली आई वह। लेकिन अब तक कुछ मिला नही।
उंचाडी थककर फिर बैठ गई।
झिंग्या मानों उसकी व्याकुलता समझ गया। पास आकर उससे लिपट गया।
उंचाडी ने आंखें मींच ली।
पेड पर बंदरी ने एक डाल से दूसरी पर छलांग लगाई। उसकी छाती से उसका पिलू लटक रहा था।
बंदरी ने झिंग्या को मुँह बिचकाया। झिंग्या उसे टुकुरटुकुर देख रहा था।
  
वह हंसा।
उंचाडी ने आंख खोली। क्यों? उसने पूछा।
बंदरी का पिलू.....। झिंग्या ने इशारा किया।
धप्प से गिरने वाला है।
उंचाडी भी हंसी। उठकर देखा- पेड पर कुछ फल थे।
थककर उसने झिंग्या की तरफ देखा। उसे उठाकर एक उंची डाल पर चढा दिया। झिंग्या गिलहरी की तरह पेड पर चढने लगा। बंदरी ने किचकिच की। लेकिन हट गई। उंचाडी ने आंखे मूंद ली। थकान भगाने लगी। धानबस्ती.... और कितनी दूर? वह पुटपुटाई।
अचानक आहट आई। उसने चौंककर देखा- आदमी थे।
उंचाडी की छाती धडकी। रोंगटे खडे हो गए।
झाड़ी से अचानक निकालकर वे उसके सामने आ गए थे।
लाल्या और उसके चार आदमी।
लाल्या ने लाठी तोली।
आंखे एकटक उसे देख रही थीं।
बाकी चारों ने उसे घेर लिया।
उंचाडी स्तब्ध।
ऊपर झिंग्या ने एक डाल पकड ली। वह निःशब्द लटकता रहा।
दो क्षण.... तीन।
बंदरी ने दांत किचकिचाए और एक छलांग लगाकर दूसरे पेड पर चली गई।
उंचाडी की आंखें डरी हुईं। ये नरबली टोली है या धानबस्ती की?
उन सारी आँखों में एक ही हवस थी-- जुगने की।
वह गडबडाई।
यह नया था।
उठा लो उसे। लाल्या चिल्लाया।
यह उदेती की सू है। जुगो इसे।
दो आदमी आगे आए। उसे गिराकर दबोचे रख्खा।
यह जुगना? एक साथ चारों का?
उसने सिर हिलाया। कुछ कहने के लिए मुँह खोला।
चुप...। लाल्या चिल्लाया। लाठी फेंक उसपर औंधा हो गया।
सारे हँसे। उन्माद में भर गए।
एक एक कर सारे जुगे। थक गए।
उंचाडी स्तब्ध रही। फिर थूकी।
उठा लो। लाल्या चीखा।
लेकिन नचंदी की रात अभी दूर है।
बली के लिए नही। इसे रखेंगे अपनी बस्ती में। यह धानबस्ती की सू है। धानबस्ती की हर सू को जुगेंगे।
लाल्या विकट हँसा।
अपनी बस्ती के सब इसे जुगेंगे।
फिर छोड देंगे इसे। जाकर बताएगी धानबस्ती में।
लाल्या भर्राए स्वर में बोला-- हमारी टोली को मिटाने की बात करते हैं वे।
जानवर। धानबस्ती के।
उनकी एक एक सू को जुगेंगे।
उंचाडी ने कुछ कहना चाहा लेकिन उन आँखों का अंगार देख कर चुप रही।
  
चारों ने उसे जकड़ लिया। एकने उसकी कमर पर लात मारी। खींचकर ले चलने लगे।
उंचाडी चीखी। लाल्या ने एक जोरदार थप्पड से उसे चुप कर दिया। चल।
आगे लाल्या। पीछे वह झुण्ड। बीच में घिरी उंचाडी।
उसने झिंग्या को पुकारना चाहा। लेकिन चुप रही। उसे लाठी से कोंचते हुए लाल्या के आदमी ले चले।
झुण्ड आंखों से ओझल हुआ तो इतनी देर से कसकर पकडी हुई डाली झिंग्या ने छोड दी। वह थाड से जमीन पर गिरा, कराहा।
फिर उठा और झुण्ड की उलटी दिशा में भागने लगा।
भागते भागते एक झरने के पास पहुँचा। वही झुककर उसने पानी में मुँह लगा दिया।
अब अंधेरा हो गया था।
सामने जाली थी करौंदे की। उसकी कंटीली झाडियाँ उठाकर वह अंदर गया। पडा रहा। थरथराते हुए। आंखों में शून्यता।
चेहरा डरा हुआ। मुँह में थूक घूमने लगा।
बगल में किसी के पांव की आहट। एक भालू डोलते हुए निकल गया।
वह औंधा हो गया। आंखें जोर से मींच लीं। जाली से टप-टप चींटे उस पर गिरते रहे।
अंधेरा बढा। थककर वह सो गया।
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44+45 ॥ ४४॥ फेंगाडया और कोमल की भेंट ॥ ४४॥॥ ४५॥ बापजी लाल्या को भरमाता है ॥ ४५॥

॥ ४४॥ फेंगाडया और कोमल की भेंट ॥ ४४॥

दो दिनों से लगातार बदरी लगी हुई थी। बरसात की झडियाँ लगती थीं। रुकती थीं। बारिश को शरीर पर
लिए फेंगाडया वेग से जा रहा था। अचानक किसी आहट से वह ठिठका और झाड़ी में दुबक गया।
सामने से कोई आ रहा था।
फेंगाडया अपनी गुफा से बहुत दूर था। उदेती की दिशा में।
पैरों की चाप पास आई। नसें तन गई। साँस रोक कर खड़ा रहा।
झाड़ियों को दोनों हाथों से हटाते हुए कोमल बाहर निकली। उसकी तेज तेज साँस से छाती हिल रही थी। खुले में आई और सूखे पेड की भाँति गिर पडी।
फेंगाडया ने दूर तक आँखें दौड़ाई। कोई नही।
अकेली ही थी यह।
बादलों के पीछे सूरज डूबने को तैयार था।
कोमल कराही। फेंगाडया ने चमककर उसे देखा।
क्षणभर विचार कर वह आगे आया। कंधे पर मरे हुए सूअर की शिकार तौलते हुए।
बोझ से कंधा जकड सा गया था।

जल्दी वापस लौटना था। समय नही था। सूअर के रक्त में भीगे कंधे टपक रहे थे।
वह कोमल के सामने आया। कोमल की साँसे अब तेज तेज थीं। चेहरा विदीर्ण। भूख से व्याकुल।
सूअर जमीन पर फेंककर फेंगाडया उकडूँ बैठा।
हाथ कोमल के सिर पर रखा।
जुगने की भूख जागी।
उसने कोमल के शरीर पर आँखें दौड़ाई।
ढीला पडा पेट। थानों में दूध टपकता हुआ।
फेंगाडया थरथरी से भर गया।
जुगने की भूख शांत हो चली।
यह पिलू जनकर भी जीवित बची हुई सू है।
एक कोमल भाव फेंगाडया के मन में जागा।
आँखें मूँदे पडी कोमल को स्पर्श का भान हुआ तो उसने आँखें खोल दीं।
सामने एक आदमी....... बलशाली।
उसकी आँखें मुस्काती हुई।
पिलू? उसने पूछा
हाँ।
कहाँ है? मृदु स्वर। छाती में धडधड।
कोमल ने धीमे से उत्तर दिया- बस्ती में है। फेंगाडया तडाक्‌ से खड़ा हुआ। शरीर तना हुआ।
भागने को तैयार। कोमल ने चिल्लाकर कहा-
रुको, मैं अकेली हूँ।
फेंगाडया को भरोसा नही हुआ। आँखें अविश्र्वास से गँदला गईं।
अकेली? बस्ती की सू है तू। पिलू जनकर भी अकेली?
मैं जंगल में भटक गई। अकेली रही। बाकी सारे निकल गए।
फेंगाडया को भरोसा हुआ।
किस बस्ती की हो? उदेती या डूब डूब?
उदेती।
फेंगाडया का मन हल्का हो गया। आँखें पारदर्शी हो चलीं।
बाई की.......धानबस्ती?
क्या सचमुच कोई बाई है?
हाँ।
कुछ याद करके फेंगाडया का चेहरा कडुआहट से भर गया।
धानवाली बस्ती........ थू। वह थूका।
क्षीण स्वर में कोमल ने पूछा-
तुम किस बस्ती से?
बस्ती? अरे हट्। वह चिल्लाया।
मैं फेंगाडया। मुझमे ताकत है।
मुझे बस्ती किस लिए चाहिए?
यह.....यह इतना बड़ा सूअर अकेला मार सकता हूँ मैं।
मुझे बस्ती की कोई गरज नही पडी।
अकेला, अकेला हूँ मैं।
कोमल को कानों पर विश्र्वास नही हुआ। क्या कहता है यह? कोई बाई नही, बस्ती नहीं, सू नहीं, पायडया,  लकुटया जैसे साथी नही, पिलू नही।



अकेला? उसने फिर पूछा।
फेंगाडया फिर बैठ गया। अंधेरा घिरने लगा।
क्या करूँ? उसका मन दुविधा में पड़ गया।
उधर गुफा में लुकडया जखमी पडा हुआ।
लंबूटांगी भी वहीं। अलाव भी राह देख रहा है। कई दिनों बाद सूअर हाथ लगा है। पेट में भूख। अकुलाने वाली।
रात गहरा गई तो उसके जाने में खतरा।
इधर अकेली पडी यह। जखमी। मरण की ओर बढती हुई।
अनिश्चय में वह उठ खड़ा हुआ।
जाओ तुम.... कोमल बुदबुदाई। औंढया देवा, उस दिन पिलू जनकर भी बच गई। सो आज मरने के लिए। जाओ तुम...। उसने गर्दन हिलाई।
फेंगाडया जाने को मुडा। दो डग चला। टिटहरी की कर्कश टिटकारी। पीछे से जानवर की आहट। तीखी गंध उसके नथुनों में भर गई।
गुरगुराहट भी कान तक आई।
फेंगाडया की छाती में एक स्वर जगा। सारा अनिश्चय खतम हुआ।
जी जान से हाथ की लाठी तौलता हुआ वह मुडा और झटके से कोमल के पास पहुँचा।
कोमल आँखें मूँदे काँप रही थी।
फेंगाडया ने चारों ओर नजर दौड़ाई। नथूने फुलाकर फिर सूँघा।
चीता था। रुका हुआ। झाड़ी में। घात लगाए।
चीते की आँखें चमकीं। लाल लाल।
गुंजा ???? की तरह।
पूरा जोर लगाकर फेंगाडया चिल्लाया।
आँखें स्थिरता से चीते पर टिकी हुई।
ओहो च् ओहो च् हो च् च् च्
आवाज चारों दिशा में गूँजा।
स्तब्धता।
चीते की गुरगुराहट। फेंगाडया ने पैंतरा बदला।
चीता अब भी अचल। लाल आँखें फेंगाडया पर गडी हुई।
कोमल ने आँखें खोलीं।
फेंगाडया का पैंतरा देखकर चकित रह गई। वह एक पाँव जमीन पर गड़ाकर तना हुआ था। बलशाली बाहू फुरफुरा रहे थे। मानों वह जमीन से उग आया था। एक विशाल पेड़ की तरह। उसके लिए उगा था।
वह थरथराई।
कभी ऐसा देखा, सुना न था। पिलू देकर अशक्त हुई सू को, जखमी आदमी को छोड़कर अपनी जान बचाने का नियम था। तैरने वाला यदि डूबने वाले की सोचे तो दोनों की जान जाएगी। यही सही था।
यही नियम सिखाया गया था।
लेकिन यह आदमी, यह फेंगाडया, वापस मुडा था। वह भी एक अनजानी, हाल में ही पिलू जनी हुई सू के लिये।
उसने फिर से एकटक देखा। देह पर रोमांच खड़ा हुआ।
यह फेंगाडया .......यही आदमी है। वह बुदबुदाई।
चार क्षणों की स्तब्धता को पत्तों की सरसराहट ने भंग किया।
चीता गुरगुराया। फिर गर्र से मुडकर कुलाँचे भरता हुआ ओझल हो गया।
फेंगाडया ने निश्र्वास छोड़ा। कोमल की तरफ मुड़ा।
उसकी आँखें कोमल की आँखों में अटक कर रह गईं।
कोमल के चेहरे पर प्रसन्नता थी। हास्य था।
फेंगाडया गडबडा गया। किसी ने उसे इस तरह नही देखा था।
यह जुगने वाली सू की आमंत्रक दृष्टि नहीं थी।

यह डरी हुई सू की भी दृष्टि नही थी।
यह कोई अलग ही दृष्टि थी।
नया था किसी का इस तरह देखना।
सम्मान से? नही। गर्व से।
नया था यह देखना।
उसे छाती की धडधड सुनाई दी।
वह आगे आया। एक झटके से जखमी कोमल को उठाकर कंधे पर डाला।
उसने दोनों बाँहें फेंगाडया के गले में डाल दीं। कंधे पर उसके दूधभरे थान कसमसाते रहे।
वह फिर भरमा गया।
सू उसके लिए नई नही थी। लेकिन दूधभरे थान नये थे। पिलू जनी हुई सू नई थी।
उसने एक झटके से कोमल को कंधे पर ठीक किया और दूसरे कंधे पर सूअर को डाल दिया।
कोमल एक हाथ बढाकर सूअर को संभालने लगी।
रात बढ चली थी। वर्षा का जोर थम गया था।
लेकिन अंधड भरी हवा चलने लगी थी।
बिजली भी कड़कने लगी।
लंबे लंबे डगों से रास्ता नापता हुआ फेंगाडया चला जा रहा था।
कंटीली झाडियाँ  दोनों का शरीर नोच रही थीं।
टहनियों की मार भी शरीर पर पड़ रही थी।
फेंगाडया के वेग से कोमल का शरीर हिचकोले ले खा रहा था।
बिजली के चमचमाते प्रकाश में कोमल को जमीन दीख रही थी।
और दीख रहे थे कीचड पर उभरते हुए फेंगाडया के मजबूत पैरों के निशान।
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॥ ४५॥  बापजी लाल्या को भरमाता है ॥ ४५॥

झरने के किनारे बैठकर बापजी अपने पैर की जखम धो रहा था।
हर बार जखम धोते हुए उठने वाली वेदना अब जैसे उसको विचारों में बस गई थी।
अंगूठा भी अब संवेदनाहीन हो चला था। काला, सूखा हुआ।
अंगूठे से ऊपर पैर पर सूजन। थुलथुल माँस।
अचानक आवाज से चौंककर बापजी ने देखा- मजबूत हाथों में लाठी लिए लाल्या सामने खड़ा था।
लम्बी लाठी- एक पुरूष उंची। पत्थर से छील छील कर उसका अगला छोर नुकीला बनाया हुआ था।
बापजी के रोंगटे खड़े हो गए।
लाल्या एक बड़े पत्थर के ऊपर खड़ा था। दोनों हाथों से लाठी मजबूती से तोलते हुए।
जल्दीबाजी कोई नही।
स्तब्धता से पांव जमीन में गड़े हुए।
आँखों में गहराई तक क्रूरता।
बापजी हड़बड़ाया।
लाल्या की लालिमा भरी आँखें।
किस टोली का है तू? लाल्या ने पूछा
बापजी ने लम्बी साँस खींची।
अगल बगल में कोई नही।
देवाच्, उस दिन बच गया। पर आज....
सूरज डूबने को है। हवा भी ठहरी हुई।
  
जानवर, पक्षी, सब चुप।
यह क्या बोल रहा है? बापजी समझ नही पा रहा है।
बाहर की किस टोली ने भेजा है तुम्हें?
बाहर की टोली ने? बापजी ने अविश्र्वास से पूछा।
हाँ।
क्यों?
हमारी टोली का नाश करने।
लाल्या ने अपना बोझ एक पैर से दूसरे पर डाला।
एक लय भरी हलचल।
बापजी हँसा, जोर से हँसा।
लाल्या क्रोध से फूंकार भरने लगा।
दूसरी टोली.... नाश करने को? बापजी बुदबुदाया।
आनंद से दोनों हाथ उठाते हुए खुद से ही बोला- जीत रहा है तू बापजी, जीत रहा है। इस लाल्या ने इतने लम्बे के जीवन में कभी विचार नही किया था कि कोई दूसरी टोली भी होगी।
और आज वह मुझे दूसरी टोली का जानकर मारना चाहता है।
बापजी उठ खडा हुआ-- ठीक है, मार डालो।
लाल्या ने आश्चर्य से एक पैर पीछे खींच लिया।
मार डालो...... यह बाल भी पक चुके। मरण तो मेरे पास ही है। मार डालो।
बापजी ने स्थिर शब्दों में कहा और गर्दन झुकाकर चुप खड़ा रहा।
दो क्षण उसकी छाती भय से कांपती रही। तीसरा क्षण उसका था।
वह आगे बढा।
लाल्या की पीठ पर धप्प से हाथ डालते हुए बोला-
समझदार हो, ताकदवर हो, पर अभी बहुत देखना है तुम्हे।
लाल्या गड़बड़ाया। लाठी नीचे झुका ली।
बापजी ने उसे अंक में भर लिया। सहलाया। गले मिला।
पाषाण्या के बाद अब ये बापजी गले मिल रहा था। लाल्या की छाती आनंद से भरने लगी।
मैं अकेला था। बापजी ने कहा
तुम बली के लिए मुझे लाए थे। दे पाए बली?
नहीं दे पाए। क्यों नही दे पाए? पूछो मुझसे।
अरे पगले, सुनो। अभी भी तू नही मार पाया मुझको। क्यों?
क्योंकि मैं वाघोबा देव से बातें करता हूँ। मृतात्माओं से करता हूँ।
मैं टोली बचा सकता हूँ।
तू अपनी लाठी लेकर मेरी टोली में आ जा। हम दोनों की टोली।
फिर देखना सभी हमारे पीछे आ जाएंगे।
पाषाण्या के राज का अंत कल  होने वाला है-- सो आज हो सकता है।
लाल्या थरथराया- नही, आज नही।
तू मना करता है। लेकिन यदि तू कहे, मैं कहूँ तो पाषाण्या जा सकता है। फिर सब कहेंगे जय लाल्या।
केवल यही टोली नहीं। धानबस्ती भी, उसकी सारी सूएँ, धान उगाने वाली सूएँ भी कहेंगी- जय लाल्या। बापजी ने चिल्लाकर कहा।
लाल्या फिर थरथराया। उससे दूर होते हुए बोला-- जय बापजी।
बापजी हँसा। एक हल्का उन्माद छाने लगा। अपने शब्दों के ताकद का उन्माद।
उठो, अब काम में लग जाओ।



धानबस्ती की टोली अभी भी आ सकती है।
हमें तैयार रहना होगा। अपने लोग तैयार रखने होंगे।
अपने लोगों को टोह लेने के लिए भेजना होगा।
जो टोह लेता रहेगा वही बच सकेगा।
बापजी ने लाल्या की आँखों में गहराई से झांककर देखा।
वहाँ थे- भय, उन्माद, और एक आतुर प्रतीक्षा भी।
और विश्र्वास भी था बापजी के प्रति।
चलो। बापजी ने कहा।
दोनों घने जंगल से चलने लगे।
लाल्या की नस नस तनी हुई थी।
हाथ की लाठी को सप्प से घुमाते हुए उसने एक उंची छलांग लगाई।
धानबस्ती के काल्पनिक आक्रमण को संबोधित करने वह गरजा--
ओ च् हो च् हो च्।
पहाड़ों से प्रतिध्वनि आई-
हो च् ओ च् ओ च् च्
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॥ ४३॥ बापजी का नया खेल ॥ ४३॥

 ॥ ४३॥ बापजी का नया खेल ॥ ४३॥

एक कातल पर स्तब्ध बैठा बापजी एकटक दूर देख रहा था।
सामने बस्ती के झोंपडें, बाहर आदमी, सू, पिलू, अलाव.......
बातें, हंसना, नाचना........।
एक बड़ा भैंसा भूना जा रहा था। साथ में कुछ छोटे खरगोश और हिरन भी।
बापजी सुखियाया।
यह केवल टोली में ही संभव है।
उसने चारों ओर आंखें दौडाईं।
कई आदमी उसे घेरकर उकडूं बैठे थे। बाट जोह रहे कि वह कुछ कहेगा। उनमे पाषाण्या था, लाल्या था।
बापजी हंसा, उसने आंखें मूंद लीं।
कितना अच्छा लग रहा है यह 'कुछ' होना।
किसी के लिए, आदमियों के लिए वह 'कुछ' है।
यों 'उपर' बैठना, और उनका 'नीचे' बैठना।
वो 'नीचे' हैं। मैं 'उपर'।
भले चंगे आदमी। लेकिन आज वे नीचे हैं और बापजी ऊपर।
वे जय कहते हैं, बापजी सिर हिलाता है।
आज इतने ही हैं। कल और होंगे- एक और टोली।
अकेले मानुस के लिए यह सुख नही है। टोली में ही मिल सकता है यह सुख। इसी सुख के लिए फिर टोली में नियम।
मुखिया कहेगा वह नियम।
बापजी ने आँख खोली। हाथ उठाकर चिल्लाया- बाघोबा दीख गया।
सारे चिल्लाए- जय वाघोबाच्।
लाल्या उठ गया। लाठी पैलता हुआ आगे आया।
एक ने कहा- हमें नही दीखा वाघोबा।
लाल्या पगला गया- चूप। बापजी को दिखा।
बापजी हंसा- जाने दो। यह मौका है मरण का।
टोली के लिए मरने का।
लाल्या तन गया। फिर चिल्लाया- आज तक टोली ने तुम्हें शिकार दी, बस्ती दी।
आज तुम्हें टोली के लिए मरण देना होगा।
जय वाघोबाच्।
सब चिल्लाए- जय वाघोबा, धानबस्ती को मरण।
बापजी उठा। एक ओर चल दिया। दूर से देखता रहा।
लाल्या गरज रहा था। लोग चिल्लाकर उसका साथ दे रहे थे।
एक झोंपडी के पास आकर बापजी बैठ गया। वहीं से देखता रहा।
अचानक सामने पंगुल्या।
बापजी ने पथरीली आंखों से उसे देखा।
बापजी का वह देखना पंगुल्या को थर्रा गया।
कांपते हुए उसके सामने उकडूं बैठ गया। दोनों चुप।
मुझे डर लगता है। पंगुल्या बुदबुदाया- लाल्या से।
बापजी ढीला पड गया। पंगुल्या की आंखों में गहरे झांकते हुए हंसा।
फिर पंगुल्या को पास खींच कर कहा-
माथा है तेरा, आंख है, कान है.... सब कुछ देख सुन कर विचार करता है तू.....। फिर डर क्यों?
मेरे साथ रह। लेकिन चुप्पी रखकर, बस।
देखो, सुनो लेकिन प्रश्न मत पूछो।
पंगुल्या भी ढीला हुआ। पूछा--
तुझे क्या चाहिए?
बापजी चुप्प रहा।
क्या धानबस्ती सच्ची है?
बापजी ने सिर हिलाया।
बाई?
हाँ।
उसके मंत्र?
बापजी हंसा- मैंने कहा तुझे- प्रश्न मत पूछना।
पंगुल्या ने पांव फैला लिए। पूछा-
क्या धान भी सच्चा है?
हां।
उदेती की ओर?
हां।
लाल्या को, इन आदमियों को तुम झूठ क्यों बता रहे हो?
बापजी का चेहरा पत्थर हो गया। उसने पंगुल्या की गर्दन पकड़ ली।
पंगुल्या गोंगों चिल्लाने लगा।
कहा ना प्रश्न मत पूछना। बापजी ने पथरीली आवाज में कहा।
पंगुल्या ने सिर हिलाया। बापजी ने पकड़ ढीली कर दी।
जा, जाकर बता लाल्या को कि बापजी झूठ कहता है।
देख, वो सुनता है क्या तेरी। देख.... जा।
पंगुल्या ने आंखें झुका लीं।
बापजी हंसा।
नहीं कहेगा तू। तुझमें समझ है। लेकिन अपने प्रश्नों को संभालो।
मुझ से बचकर रहो..... जाओ।
थरथराता पंगुल्या चला गया।
बापजी फिर ढीला हुआ।
मैं झूठ क्यों बताता हूँ?
अरे, देव ने यह सारी टोली मुझे दी है।
देखो......। धानबस्ती को मरण, मरण, मरण कहकर नाच रहे हैं सब।
इन्हें छोडने वाला हूँ मैं धानबस्ती पर।
मरण का एक नया खेल खेलेगा यह बापजी। आजतक ऐसा खेल नही था। अब होगा।
दो वराहों को लड़ते देखा है? दोनों टकटराते हैं। भिडते हैं। दोनों जखमी होते हैं। दोनों मर जाते हैं।
वैसे ही यह दोनों टोलियाँ भिडेंगी।
दोनों नष्ट होंगी।
बलि के लिए लाया बापजी जीतेगा।
बापजी ही जीतेगा।
बापजी थक गया।
झोंपडी में घुसकर करवट लेकर सो रहा।
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॥ ४२॥ धानबस्ती में कोमल पर फूलों की बरसात ॥ ४२॥

॥ ४२॥ धानबस्ती में कोमल पर फूलों की बरसात ॥ ४२॥

देखते देखते ढेरों फूल इकट्ठा किए गए। बाई के इशारे पर कोमल आगे आई।
धान, फूल और सू........ कोमल बुदबुदाई। तीनों किसी सू के पिलू की तरह। सू पिलू। तीनों जनमते हैं, फूलते हैं और सिर झुकाकर जमीन में सो जाते हैं।
धानबस्ती के सूएँ इकट्ठी हुईं। रीति के अनुसार कोमल आगे आई। कातल पर बैठ गई। हाथ में उसका पिलू था। उसने दोनों आंखे बंद की।
पिलू थान पी रहा था।
सर्वत्र शांती।
पायडया आगे आया, बाई को हाथ से पकड़कर आगे ले गया। बाई कोमल के पास बैठ गई। पायडया खड़ा था। आकाश में पूरा चंद्रबिम्ब प्रकाशित था। चांदनी छिटक रही थी।
आदमी थोड़ी दूर पर गोल बनाकर बैठे थे।

वे भी धानबस्ती के काम आ रहे हैं।
औंढया ने यों ही नही बनाया है आदमी को।
सूरज उपर आ गया। आकाश में भरे बादल भी थे। लेकिन अभी वर्षा नही थी।
गिरते पड़ते कोमल उठी। पैर खींचती हुई बस्ती की ओर चलने लगी।
चांदवी इधर उधर घूम रही थी। उसी ने कोमल को देखा।
वह चिल्लाई- कोमल।
बाई चौंक गई। पलभर वह अपने आप पर विश्र्वास नही कर पाई। कोमल पिलू जनकर भी जीवित रही? उसने आनंद से अपनी छाती पीटी-- औंढया की कृपा।
पायडया ने भी चांदवी की हांक सुनी। वह दौड़ आया। सीधा कोमल की तरफ।
कोमल को उठाकर उसने कंधे पर डाल लिया और दौड़ने लगा बाई की तरफ।
सारे जमा हो गए। आनन्द से छाती पीटने लगे।
पायडया के पीछे दौड़ने लगे।
बाई ने अब नाचना शुरू किया। गोल गोल......।
ताली बजा कर।
पायडया ने कोमल को नीचे उतार दिया। इतने श्रम से वह हांफने लगी। बेसुध होने लगी।
बाई कोमल के पास आकर बैठ गई। अंगुलियों से कोमल का थान दबाया। दूध निकल आया।
बाई चिल्लाकर बोली- पिलू लाना।
चांदवी पिलू लेकर आई। वह नई नवेली सू पिलू आंखें बंद किए मुट्ठी चूस रही थी।
बाई ने पिलू को लिया। संभाल कर उसे कोमल की छाती पर औंधा रख दिया।
कोमल सुध में आई। पिलू के हाथ पांव की हलचल से उसे सुख होने लगा।
पिलू ने सिर घुमाया। इधर उधर ढूँढ कर थान को पा ही लिया। उसे चूसने लगा। अधाशी(?) की तरह।
आनंद से सारे झूमने लगे। कोमल को घेर कर नाचने लगे।
बाई पालथी मारकर पिलू को संभाले बैठी रही।
कोमल ने अतीव सुख में भरकर उसे देखा।
बाई ने सिर हिलाया।
पिलू जनना, जनकर जीवित रहना, पिलू को अपने थान से दूध पिलाना..... यह नया अनुभव। कोमल ने बाई को देखा। बाई यह कर चुकी है। उसे पता है ये सब।
आगे बढकर कोमल को चूमते हुए बाई की आवाज रुंध गई- मेरी पिलू।
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॥ ४१॥ फेंगाडया भरमाता है ॥ ४१॥

॥ ४१॥ फेंगाडया भरमाता है ॥ ४१॥

दोपहर का सूरज ढलने लगा था।
फेंगाडया शिकार के लिए बाहर गया था।
लुकडया की वेदना थम नही रही थी।
वह सरक कर गुफा के बाहर आ जाता था।
उसे कंधे से दबाकर वापस गुफा में खींचते खींचते वह थक गई। पास आकर बैठ गई।
कच्च्‌ से लुकडया ने उसकी बांह पर काट लिया। चीख कर उसने लुकडया को छोड़ दिया। सारा जी समेटकर लुकडया फिर गुफा के बाहर घिसटने लगा।
दहिना पैर मानों आग हो गया।
कराहते हुए वह आगे घिसटता रहा।
लंबूटांगी क्रोध में पागल हो गई। लकुडया की पीठ पर उसने जोर से वार किया।
वह थम कर रुक गया। बिना हिले डुले पडा रहा।

  
लंबूटांगी घुटनों में मुँह डालकर बैठी रही।
दो दिन और दो रात बीत चले थे। लुकडया बेकाबू हो रहा था।
अचानक गुफा के बाहर कुछ खुसफुसाया। एक उग्र गंध नाक में समा गई।
बाघ.....। लम्बूटांगी ने चीख चीख कर हल्ला मचा लिया।
थरथराती हुई वह चीखती रही......।
एक उलटी छलांग लगाकर वह जानवर चला गया।
क्या पता कैसे।
थरथराते हुए लम्बूटांगी बैठ गई। देर तक वैसी ही बैठी रही।
दमदार पैरों की आवाज आई। वह चौंक गई।
फेंगाडया अंदर आया। कंधे पर से हिरन उतार कर जमीन पर फेंक दिया।
लुकडया को यों पडा देख कर सन्न रह गया। लम्बूटांगी आगे आई। थरथराती उससे लिपट गई।
बाघ.... बाघ आया था।
फेंगाडया की आंखों में चिंता छा गई। उसने लम्बूटांगी को भींच लिया। उसकी नसें तन गईं।
अवश अवेग से लम्बूटांगी उसकी बाँहों में समा गई। चुंबनों की बौछार।
दोनों जुगने लगे। फिर शांत हुए।
कुछ देर में फेंगाडया उठा। लम्बूटांगी को अपने से अलग किया और अलाव जलाने लगा।
लम्बूटांगी हिरण भूजने लगी।
फेंगाडया चलकर लुकडया के सामने खड़ा हो गया।
लुकडया की आँखें भर आईं। मुँह फेर कर वह रोने लगा।
फेंगाडया को यह सब असह्य होने लगा।
ताडताड चल कर वह गुफा से बाहर पठार की कगार पर आ गया। उसके पेड़ के पास।
नीचे गहरी घाटी थी। घनी झाड़ी।
सूरज डूबा। घाटी पर एकाएक घना अंधेरा छा गया।
फेंगाडया बैठा रहा।
आकाश में इक्का दुक्का नक्षत्र चमकने लगे। फेंगाडया ने मुडकर देखा। दूर गुफा में हिरन भूँजा जा रहा था।
दहिनी ओर अपनी गुफा। बांई ओर यह गहरी घाटी। चारों ओर अंधेरा.... आकाश के नक्षत्रों को भी समेटने वाला।
वह नही था और बाघ आ गया।
फिर आया तो अकेली लम्बूटांगी क्या कर लेगी?
यह सारा नया था। बाघ के लिए भी।
दिनभर गुफा में कोई नही होता था- आदमी की गंध के सिवा।
लेकिन आज नया घटा है।
लुकडया का पाँव टूटा हुआ। वह अकेला कैसे रहेगा?
इसलिए लम्बूटांगी भी बैठी उसके साथ गुफा में।
लेकिन फेंगाडया कैसे बैठ सकता है?
उसकी भूख है। लम्बूटांगी की भूख है, लुकडया की भूख है। सब के लिए शिकार उसे ही लानी है।
इसलिए फिर फिर यही घटेगा। बाघ फिर आएगा। बार बार वापस नही जाएगा। किसी दिन दोनों को फाड़ कर खा लेगा।
उस रात वह वापस आएगा तो देखेगा-
मरी हुई लम्बूटांगी- फाड़ा हुआ लुकडया- आधा खाया हुआ।
उसने सिर हिलाया।
तो फिर उस दिन लुकडया को वापस लाकर क्या किया? एक लुकडया को क्यों बचाया? दो को मरवाने के लिए?
देवाच् वह चीखा।



देवा च् तुम्हारी आवाज क्यों सुनी?
ये, ये देखने के लिए?
उसने फिर एकटक गुफा की ओर देखा। गुफा में लम्बूटांगी। अंदर अलाव की चमक। लुकडया।
अचानक अलाव लहलहाया।
वह प्रकाश फेंगाडया की छाती में भर गया। उसकी आँखों में उतर आया।
उसकी आँखों ने साफ देखा- कई सारी सू..... कई पिलू.... कई आदमी। लुकडया अकेला नही था। उसे घेरकर आदमी बैठे थे- बतियाते हुए।
लम्बूटांगी अकेली नही- दूसरी सूओं के साथ नाच रही थी- धान फेंक रही थी।
पिलू इधर उधर दौड़ लगा रहे थे।
एक कातल पर बापजी बैठा था... पास के कातल पर फेंगाडया। दोनों हँस रहे थे। बातें कर रहे थे।
अलाव जल रहा था।
भैंसा भूना जा रहा था।
बड़ा भैंसा..... छोटा सूअर या हिरन नही।
अंधेरा भी इतना सुन्न करने वाला नही।
नक्षत्र भी इतने अकेलपन में नही।
पेड़ ऐसे पराए नही।
अलाव ऐसा शांत नही।
शोर है आदमी का, सूओं का, पिलूओं का। कोई चिल्ला रहा है। कोई भाग रहा है। बापजी हंस रहा है। फेंगाडया भी हंस रहा है। लोग नाच रहे हैं। अलाव के चारों ओर डोल रहे हैं।
कोई बुढिया झगड़ रही है। कोई खाँस रही है। यहाँ मुझे लुकडया की क्या चिन्ता? कुछ भी तो नही।
लम्बूटांगी की पुकार से फेंगाडया होश में आया। वह हाथ हिला हिला कर उसे पुकार रही थी।
हिरन....।
वह अलाव के पास गया। एक टांग उसके आगे रखकर लम्बूटांगी लुकडया को टुकड़े खिलाने लगी।
मांस उठाकर फेंगाडया बाहर आया। सर्वत्र देखा।
कोई नही था।
देवाच् मैं भरमा गया......।
मैं सो रहा हूँ या जाग रहा हूँ?
पहले छाती में कुछ हिला- लुकडया को अकेला, जखमी देख कर।
फिर छाती में कुछ बजा- उठा लिया उसको।
और आज ये अनदेखा देखना।
बस्ती ही थी वो। धानबस्ती।
बापजी जाने से मना करता था लेकिन बतियाता था इसी के बारे में।
सिर झटक कर वह वापस गुफा में गया।
लुकडया आज खा रहा था। लम्बूटांगी उसे खिला रही थी। लुकडया का विरोध बंद हो गया था। लेकिन फेंगाडया को देखकर वह तिरस्कार से थूका।
यही ना.....। कई ऋतु तक.... मैं ऐसे ही खाऊँगा- पडे पडे। फिर मर जाऊँगा।
फेंगाडया ने सिर हिलाया। लुकडया के दुखते पांव के पास वह उकडूं बैठ गया। धीरे से लुकडया की जांघ पर हाथ फेरा। लकड़ी के दोनों फट्टे ठीक किए। बेलों की गांठ को थोड़ा कस दिया। लुकडया कराह उठा। लेकिन इस तरह बांधने से जांघ की वेदना कम हो रही थी।
एक आवेश से फेंगाडया उठा।
तू चलेगा लुकडया। तू जिएगा.....तू चलेगा।
लम्बूटांगी चकित होकर उसे देखने लगी।



फेंगाडया चकित होकर उसे देखने लगी।
फेंगाडया का आवेश उफन रहा था। अपनी जांघ दिखाते हुए बोला- देखो.... भालू ने काटा था। कई ऋतु पहले की बात है। बापजी था तब। इतना माँस नोच लिया था- उसने मुट्ठी से इशारा किया।
लेकिन अब? है कोई गड्ढा? है कोई दुख?
नही।
भर गया यहाँ मांस?
फेंगाडया अब हांफ रहा था।
मांस भर जाता है। इतना बडा गड्ढा भर गया।
फिर हड्डी क्यों नही भरेगी?
भरेगी। लुकडया की हड्डी भरेगी।
लुकडया और लम्बूटांगी के चेहरे पर अविश्र्वास देखकर वह चिढ गया। उठकर लम्बूटांगी को कंधे से झकझोर दिया।
लेकिन उसका चेहरा वही निर्विकार।
चिढ कर फेंगाडया थूक दिया और ताडताड चलकर फिर आया पेड़ के पास। उसके तने से टिक गया।
सिर पर विशाल पेड़ फैला हुआ था- पत्ते, फूल, फल।
निश्चय से वह बुदबुदाया- हड्डी भरेगी।
वह उठा और एक डाली को बीच से तोड दिया।
ये डाली बढती है- तोड़ो तब भी बढती है। केवल जड़ का आधार मजबूत चाहिए। जड़ को निश्चय से टिके रहना चाहिए। डाली को संभालने वाला मजबूत जड़। और हाँ, साथ में वर्षा भी चाहिए।
देवाच् मैं मजबूती से खड़ा हूँ। मैं हूँ लुकडया का पेड। मेरी बांहे मजबूत हैं।
हिरन, सूअर, खरगोश की शिकार है, भूख के लिए ग्रास है।
लुकडया की हड्डी भरेगी।
हांफते हुए वह बैठ गया। सामने देखने लगा।
अलाव बुझ रहा था।
उसे लगा- थोड़ी देर पहले देखे वे सारे लोग अपनी अपनी गुफा में चले गए हैं।
कल सूरज उगेगा।
सारे बाहर निकलेंगे।
नया दिन निकलेगा।
लुकडया झोंपडी से बाहर आकर उसकी पीठ पर धौल मारकर उससे लिपट जायगा।
फेंगाडया हंसता हुआ उठा और गुफा में जाने लगा।
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