॥ ७९॥ वाघोबा टोली धावा बोलने को तैयार ॥ ७९॥
रात गहरी हो चुकी थी।
लेकिन बापजी एकटक जाग रहा था।
टीसता पैर। उसकी काली रेखा अब घुटने तक बढ आई थी।
दर्द से बापजी सिहर उठा।
काली रेखा ऊपर तक आ रही थी।
रेखा के ऊपर जांघ का हिस्सा अब टीसने लगा था। उंगली लगाओ तो दुखता था।
दुखता है, तो वह अबतक बापजी
के शरीर का भाग है।
लेकिन अंगूठे का भाग अब
दुखता भी नही था। मानों वह शरीर का भाग था ही नही। कोलाहल सुनकर बापजी मुडा।
बाहर कुछ हो रहा था।
लाल्या के साथ कई लोग हाथ
में लम्बी लाठियाँ लिए थे।
लाल्या ने बापजी के पैर छूए।
सारे खडे रहे। लाल्या के
बताए अनुसार।
एक सीधी रेखा में। ऐसी चार
रेखाएँ।
एक ओर खडी थी नई बस्ती पर
लाई गई सू।
बापजी ने लम्बी सांस खींची।
आंखे बंद की। जाओ। वाघोबा तुम्हारे साथ है। सारे जाओ। लाल्या छोडकर। लाल्या पीछे
रहेगा।
लाल्या ने चमककर देखा। बापजी
हंसा।
मरण की आँधी है ये। किसी को
भी घेर सकती है। लाल्या सबमें उंचा है। मुखिया है।
उसको बचना होगा।
लाल्या संभल गया। चिल्लाया-
जय वाघोबा। बापजी फिर हंसा।
जो मुखिया है, जो सू है,
पिलू हैं, बूढे हैं....... राह समझाने वाले हैं, वे सारे पीछे रहेंगे।
बाकी तुम सब जाओ। उस टोली को
आज मार डालो। कलका सूरज देखने को न मिले उन्हें। हमारी टोली सारी टोलियों में उंची
रहनी चाहिए। सबसे उंची।
हमारी टोली बचेगी तो आदमी
बचेंगे।
जय वाघोबाच्। फिर एक बार
स्वर गूँजा।
सारे चले गए। दूर निकल गए।
बापजी पेड के पास बैठा। साथ
में लाल्या। उसका चेहरा मुरझा रहा था।
बापजी ने उसे अपने पास
खींचा।
आदमी-आदमी के बीच यह मरण का
खेल है लाल्या।
आदमियों में जो भैंसे हैं
उनके लिए है यह लड़ाई।
तुम्हारे और मेरे लिए नही।
हमारी टोली के भैंसों को हम
उकसाएंगे इधर से। उनकी टोली से वे उकसाएंगे। उस टोली के लाल्या, उस टोली के बापजी।
लाल्या चौंक गया।
उधर भी होगा लाल्या? उधर भी
होगा बापजी?
फिर? वे क्या सोए रहेंगे?
पीठ तुम्हारी ओर करके
कहेंगे- लो मार लो। नही। वे भी आएंगे। मारने की तैयारी से।
फिर तो सभी मरेंगे।
लाल्या कांप गया।
तुझे क्या लगता है?
इसीलिए तो तुझे खींच लिया
पीछे।
अरे, जो टोली के मुखिया होते
हैं-- लाल्या, बापजी...... वे कभी नही मरते।
जब मरण का खेल रुक जाता है,
तब वे बचे रहते हैं। सू से जुगने के लिए। बैठकर खाने के लिए।
भैंसों का काम है लडना।
बापजी, लाल्या का काम है उन्हें लडने के लिए कहना।
बापजी रुक गया।
अपने को संभाल कर बोला-
लाल्या, बापजी के कहे में
हां मिलाने वाले ये भैंसे- उन्हीं के लिए है मरण का खेल। उन्हीं को मरना है। जय
वाघोबा कहते हुए मरना है। या मारना है।
क्यों? पता है?
क्या वाघोबा के लिए?
टोली के लिए?
नही।
तेरे लिए। मेरे लिए।
तुम अभी नही समझोगे। बापजी
थूका।
जा.... तू जा। किसी सू के
साथ जुग।
फिर ठण्डा होगा।
बापजी ने चिल्लाकर कहा।
लाल्या उठा। चला गया।
दूर चढाई पर बापजी ने आदमी
देखे।
उत्साह से मरने निकले थे।
दो पैरों वाले भैंसे जा रहे
हैं। देवाच् देख।
बापजी हंसा। फिर उसने पांव
हिलाया। तीव्र वेदना।
वह कराहा।
वहीं पसर गया।
करवट लेकर कराहते हुए पडा
रहा।
-----------------------------------------------------
No comments:
Post a Comment